“क्राइम का किस्सा”: 43 साल पहले हुआ वो ‘डबल मर्डर’ जिसने 1970 के दशक में मोरारजी देसाई हुकूमत की चूलें हिला दी थीं | Delhi Double Murder Case Sanjay Chopra and Geeta Chopra Morarji Desai Ranga Billa Hanging

क्राइम का किस्सा: 43 साल पहले हुआ वो 'डबल मर्डर' जिसने 1970 के दशक में मोरारजी देसाई हुकूमत की चूलें हिला दी थीं

दिल्‍ली डबल मर्डर केस. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

“क्राइम का किस्सा” में इस बार चर्चा करता हूं अब से करीब 43 साल पहले हुए डबल-मर्डर का. उस डबल मर्डर के किस्से का चर्चा जिसने तब की हिंदुस्तानी हुकूमत (प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई सरकार) की चूलें हिला दीं थीं. उस लोमहर्षक दोहरे हत्याकांड ने न सिर्फ हिंदुस्तानी हुकूमत को हिला दिया था, अपितु देश के बाहर की दुनिया को भी झकझोर कर रख दिया था.

क्योंकि उस जमाने में हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली में उससे ज्यादा लोमहर्षक डबल मर्डर कभी किसी ने होते देखा-सुना ही नहीं था. उस सनसनीखेज घटना में हत्यारों ने किशोरवय उम्र के सगे-भाई बहन को अपहरण के बाद कत्ल करा डाला था. क्रूर काल के हाथों रुह कंपा देने वाली मौत मारे गए निडर भाई-बहन का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने अपहरणकर्ताओं के सामने हार नहीं मानी. लिहाजा भाई-बहन की बहादुरी से हारे और खुद को चारों ओर से फंसता देख अपहरणकर्ताओं ने उन दोनों का कत्ल कर डाला.

भाई-बहन के कत्ल ने हिला दी हुकूमत

कत्ल के बाद दोनों लाशें फेंक दीं नई दिल्ली इलाके के रिज एरिया (धौला कुआं से करोल बाग हनुमान मंदिर की मूर्ति वाले सूनसान रोड पर) के जंगल में. भाई बहन भारतीय सेना (जल सेना) के एक उच्चाधिकारी की संतान थे. बहन दिल्ली के मशहूर जीसस एंड मेरी कॉलेज की छात्रा थी. जबकि भाई मॉर्डन स्कूल का छात्र. वे दोनों एक कार्यक्रम की रिकार्डिंग के लिए शाम के वक्त ऑल इंडिया रेडियो के लिए धौला कुंआ के पास स्थित घर से निकले थे. उसके बाद वापस घर नहीं लौटे.

भाई बहन के अपहरण और डबल मर्डर की उस वारदात को अंजाम दिया गया था 26 अगस्त सन् 1978 को यानी अब से करीब 43 साल पहले. उन दिनों देश में हुकूमत थी मोरारजी देसाई की. भारतीय फौज (नेवी) के एक जांबांज अफसर के निर्दोष बेटा-बेटी की निर्मम हत्या ने आमजन के गुस्से का सैलाब दिल्ली और देश के तमाम इलाकों में ला दिया. हत्यारे किसी भी कीमत पर पकड़ में नहीं आ रहे थे. दिल्ली और देश की जनता में गुस्से का उबाल इस बात पर भी था कि, दोनों बच्चों के हत्यारे दिल्ली पुलिस के हाथ में आने के बाद भी साफ बच निकले थे.

शिकंजे में आकर भी हत्यारे निकल गए!

रात को कुछ समय उन संदिग्धों को थाने की पुलिस ने अपने पास रखा भी. इसके बाद भी मगर थाना पुलिस यह नहीं ताड़ सकी कि हाथ आए वे दोनो संदिग्ध, भाई-बहन के अपहरणकर्ता और कातिल हैं. लिहाजा पुलिस की इसी कमजोरी का बेजा फायदा उठाकर शातिर दिमाग कातिल कानून के शिकंजे में से साफ बचकर निकल गए. हत्यारों की गिरफ्तारी न होने से देश में गुस्सा उस हद तक का बढ़ा कि, हिंदुस्तानी हुकूमत के सर्वे-सर्वा यानी तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को ही देश की जनता के सामने हत्यारों की तत्काल गिरफ्तारी संबंधी बयान देने को मजबूर होना पड़ा.

अंतत: 8-9 सितंबर 1978 को बहादुर बच्चों के अपहरणकर्ता-हत्यारों को आगरा में पकड़ा भी हिंदुस्तानी सेना के ही एक सजग फौजी लांस नायक ए.वी. शेट्टी (Lance Naik A.V. Shetty) ने. दोनों हत्यारे (संदिग्ध) चोट लगे हाथ में पट्टी बांधे आगरा जाने वाली ‘कालका मेल’ ट्रेन के सेना के लिए आरक्षित कंपार्टमेंट में सवार थे. उसी कंपार्टमेंट में फौजी लांस नायक ए.वी. शेट्टी भी बाकी फौजी साथियों के साथ यात्रा कर रहे थे. ए.वी. शेट्टी हत्यारोपियों को ट्रेन में पकड़ने से एक दिन पूर्व ही अखबार में छपी उनकी तस्वीरों से उनके चेहरों को पहचान चुके थे.

पुलिस की बजाए फौजी ने पकड़े कातिल

एवी शेट्टी ने संदिग्धों को पकड़ पूछताछ शुरू कर दी. लिहाजा बात खुल गई. आरोपियों ने कबूल लिया कि वे दिल्ली में अपहरण करके मार डाले गए भाई-बहन के कातिल हैं. गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के अपहरण और कत्ल के आरोप में कुलजीत सिंह उर्फ रंगा खुस और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला को लांस नायक ए.वी. शेट्टी ने पकड़ कर, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन थाने के उन दिनों एसएचओ रहे इंस्पेक्टर वी.पी गुप्ता के हवाले कर दिया. संजय और गीता चोपड़ा हत्याकांड के कई अनछुए पहलूओं पर भी आज 43 साल बाद यहां चर्चा करना जरुरी है.

मसलन दोनों भाई बहन को हिंदुस्तानी हुकूमत ने 5 अप्रैल 1981 को मरणोपरांत ‘कीर्ति-चक्र’ जैसे विशेष सम्मान से सम्मानित किया था. क्योंकि कत्ल कर डाले गए दोनों बहादुर भाई बहन ने आखिरी सांस तक डटकर हत्यारों का मुकाबला किया था. अद्भूत बहादुरी का परिचय देकर दोनों ने खुद की जान तो गंवाना गंवारा किया मगर अपहरणकर्ता-हत्यारों के सामने घुटने नहीं टेके. उनकी उसी बहादुरी का नतीजा था कि, अपहरणकर्ता भी दोनों भाई-बहन से हुई गुत्थम-गुत्था में अपने हाथों पर चोट का जख्म ले बैठे. उसी जख्म से पहचान करते हुए फौजी एवी शेट्टी ने दोनों को ट्रेन में (आगरा में यमुना ब्रिज पर) धर दबोचा था.

अब से पहले देश में कभी ऐसा नहीं हुआ

अमूमन हिंदुस्तान में अब तक के इतिहास में ऐसा शायद कभी नहीं हुआ कि कत्ल कर डाले गए, किसी आम इंसान को सेना के ‘कीर्ति-चक्र’ जैसे सम्मान से सुशोभित किया गया हो.”क्राइम का किस्सा’ में उल्लेखनीय यह भी है कि दोनों बहादुर भाई-बहन की याद में हिंदुस्तानी हुकूमत ने. उन्हीं दोनों के नाम से उनकी याद में कालांतर में ‘संजय चोपड़ा गीता चोपड़ा’ बहादुरी पुरस्कार भी शुरू करने की घोषणा की थी. जो आज तक हर साल देश भर से चुने गए चंद बहादुर बालक-बालिकाओं में से भी ‘सर्वोत्तम-बहादुर’ को हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री के हाथों प्रदान किया जाता है. देश-दुनिया और हिंदुस्तानी हुकूमत की चूलें हिला देने वाले संजय चोपड़ा गीता चोपड़ा दोहरे हत्याकांड में एक और भी कभी न मिटने वाली तारीख दर्ज है.

इस तारीख को भी नहीं भूल सकते

कभी न मिटने वाली यह तारीख थी 30 जनवरी 1982. इसी तारीख को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने देश के 5 भारतीय पत्रकारों (इनमें दो महिला पत्रकार भी शामिल थीं) को, जेल के अंदर दोनों हत्यारोपियों का इंटरव्यू लेने की इजाजत दी थी. मुजरिमों को फांसी के फंदे पर टांगे जाने से ठीक 24 घंटे पहले. तिहाड़ जेल में इंटरव्यू करने के लिए पहुंचे इन पत्रकारों से, जेल में फांसी के फंदे पर टंगने की उलटी गिनती गिन रहे जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला ने तो बातचीत की. उसके दूसरे साथी हत्यारे साथी रंगा ने मगर पत्रकारों को इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया. इसके अगले ही दिन यानि 31 जनवरी 1982 को दोनो को फांसी के फंदे पर टांग दिया गया.

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