टिशू कल्चर वाली केले की फसल लगाए और खूब कमाएं, जानिए इसके बारे में सबकुछ | Farmer latest news Tissue Culture Plants Techniques Agri Farming Why do farmers use tissue culture What is tissue culture in agriculture

सब्जीवाले केले की प्रमुख किस्मों के बारे में जानिए

पौधे के ऊतकों (Tissue) का एक छोटा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए ऊपरी हिस्से से लिया जाता है. इस टिशू के टुकड़े को एक जैली (Jelly) में रखा जाता है जिसमें पोषक तत्व और प्लांट हार्मोन होते हैं. ठीक ऐसे ही, कुछ मूल पौधों की मदद से टिशू कल्चर (Tissue Culture) की यह तकनीक अपनाते हुए कई छोटे-छोटे पौधे तैयार किये जा सकते हैं.

सुमन कुमार चौधरी

किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार और कृषि वैज्ञानिक लगातार कदम उठा रहे हैं. इसी कड़ी में आज टिशू कल्चर के बारे में जानकारी दे रहे हैं. कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, केले की उन्नत प्रजातियों के पौधे तैयार किये जा रहे हैं. ये पौधे स्वस्थ, रोग रहित होते है सभी पौधों में पुष्पन, फलन, कटाई एक साथ होती है, जिसकी वजह से मार्केटिंग में सुविधा होती है फलों का आकार प्रकार एक समान एवं पुष्ट होता है. प्रकन्दों की तुलना में ऊतक संवर्धन द्वारा तैयार पौधों में फलन लगभग 60 दिन पूर्व हो जाता है.

क्या है टिशू कल्चर

डॉ राजेंद्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के अधीनस्थ केला अनुसंधान संस्थान गोरौल में केला के उन्नत टिश्यू कल्चर द्वारा तैयार किए गए. पौधे के ऊतकों (Tissue) का एक छोटा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए ऊपरी हिस्से से लिया जाता है. इस टिशू के टुकड़े को एक जैली (Jelly) में रखा जाता है जिसमें पोषक तत्व और प्लांट हार्मोन होते हैं. ठीक ऐसे ही, कुछ मूल पौधों की मदद से टिशू कल्चर (Tissue Culture) की यह तकनीक अपनाते हुए कई छोटे-छोटे पौधे तैयार किये जा सकते हैं. फल वैज्ञानिक डाक्टर एस के सिंह के मुताबिक टिशू कल्चर सबसे बेहतरीन विधि बन गया है इससे किसान कम समय में अधिक फायदे उठाते हैं.

किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है टिशू कल्चर

केले की तो देश में 500 से अधिक प्रजातियां हैं लेकिन उत्तक संवर्धन विधि यानी टीस्सू कल्चर किसान को ज्यादा फायदा दे रही है.

इस विधि से इस प्रकार रोपण के बाद 13-15 माह में ही केला की पहली फसल काट लेते हैं जबकि प्रकन्दों से तैयार पौधों से पहली फसल 16-17 माह बाद मिलती है.

इसकी खासियत यह भी है कि इससे तैयार पौधों से औसत उपज 30-35 किलोग्राम प्रति पौधा तक मिलती है. पहली फसल लेने के बाद दूसरी खुटी फसल (रैटून) में गहर 8-10 माह के भीतर पुनः आ जाती है. इस प्रकार 24-25 माह में केले की दो फसलें ली जाती है.

ऊतक संवर्धन की सफलता तथा अधिकतम लाभ हेतु मातृ पौधों का चयन करना एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि मातृ पौधे के ऊतक से ही नये पौधे ऊतक संवर्धन से ही तैयार किए जाते हैं. आवष्यकता इस बात कि है कि ऐसे मातृ पौधों का चयन किया जाए जो अपनी प्रजाति के सम्पूर्ण गुण रखता हो, उच्च उत्पादकता हो तथा विषाणु रोगों से मुक्त हो.

पौधा स्वस्थ हो तथा जिसकी पुष्टि उसकी सामान्य बढ़बार की दर से होती है.आभासी तना पुष्ट एवं मजबूत होना चाहिए जो पूरे पौधे को एक मजबूत आधार दे सकें.

पौधे मे औसतन 13-15 स्वस्थ पत्तियां होनी चाहिए जो पौधे के सक्रिय वृद्धि अवस्था मे आवष्यक प्रकाष संष्लेषण की क्रिया को सम्पन्न कर सकें.

पौधे के अन्दर ऐसा गुण होना चाहिए, जिससे कम से कम समय फसल के तैयार होने में लगे.अपनी प्रजाति के अन्य पौधों के औसत से ज्यादा उपज क्षमता होनी चाहिए. फल की गुणवत्ता, अपनी प्रजाति के गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाला होना चाहिए.

पौधे पर कोई भी विषाणुजनित रोगों का लक्षण नही दिखाई देना चाहिए. डाक्टर सिंह का मानना है कि टिस्सू कल्चर से केले के पौध शुरुआत में किसान किसी सरकारी संस्था से ही लें जैसे पूसा यूनिवर्सिटी में एक जगह है वहां से लेगें तो लगाने से लेकर हर तरह की जानकारी मिलेगी और अच्छी कमाई हो.

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