विशेषांकः बुनकरों के हमदर्द – Handmade in India

खुशी की खोज/खुशी के वाहक

सितंबर की एक खुशनुमा सुबह अहमदाबाद से कोई 120 किलोमीटर दूर सुरेंद्रनगर और उसके आसपास के बीसियों आदमी-औरतें हथकरघा प्रशिक्षण केंद्र पर इकट्ठा होते हैं. इस केंद्र का संचालन आंत्रप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (ईडीआइआइ) करती है, जिसकी स्थापना 1983 में देश के कुछ बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने की थी. उनमें ज्यादातर पारंपरिक बुनकर परिवारों से हैं, जो अब डिजाइन, मार्केटिंग और टेक्नोलॉजी में आए बड़े बदलावों को पकड़ने में जुटे हैं.

ईडीआइआइ और कंसल्टिंग फर्म ईवाइ ने इसे स्वायत्त पहल के तौर पर शुरू किया था. 2019 में इसे एचएसबीसी बैंक का सहारा मिला. सुरेंद्रनगर और पांच दूसरी जगह इसके केंद्र 6,000 हथकरघा बुनकरों को अब तक प्रशिक्षण दे चुके हैं. प्रशिक्षण के दूसरे केंद्र गुजरात के भुज, मध्य प्रदेश के महेश्वर, असम के कामरूप, ओडिशा के बरगढ़ और तमिलनाडु के सेलम में हैं.

ईडीआइआइ के डायरेक्टर जनरल डॉ. सुनील शुक्ला कहते हैं, ”हमारी प्राथमिकता यह है कि नए डिजाइन तैयार करने, कर्ज हासिल करने, नए बाजार खोजने और नई टेक्नोलॉजी का फायदा उठाने में बुनकरों की जाए.’’ 

हथकरघा क्षेत्र में तरह-तरह के उत्पाद हैं. मसलन, पतले सूती तौलिए, साड़िया, शर्ट, पैंट और शॉल, और बैग, पर्स, मैट, कैप, टॉवेल, बेड लिनेन, कालीन और परदे, वगैरह. तीसरी हथकरघा गणना (2009-10) से पता चला कि ग्रामीण इलाकों में करीब 28 लाख परिवार बुनाई और उससे जुड़े कामों में लगे थे, ग्रामीण इलाकों में 87 फीसद. देश में चल रहे कुल हथकरघों में 65.2 फीसद पूर्वोत्तर में थे. यह क्षेत्र 44 लाख बुनकरों को रोजगार देता है, जिनमें ज्यादातार औरतें हैं.

शुक्ला कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती पारंपरिक कारोबार में अगली पीढ़ी की दिलचस्पी न होना है. कारोबार करने के तौर-तरीकों को लेकर उनकी झिझक और आशंकाओं को खत्म करने के लिए विश्वास बढ़ाने के कई उपाय करने पड़े. बुनकरों को अपना कारोबार उद्यम के तौर पर चलाने के प्रशिक्षण के अलावा ईडीआइआइ ने प्रदर्शनियां (महामारी की वजह से वर्चुअल) आयोजित करने, ऑनलाइन खरीदार और बाजार विकसित करने में भी मदद की.

2020 में आयोजित एक वर्चुअल प्रदर्शनी में यूएई, अमेरिका और ब्रिटेन के खरीदारों की दिलचस्पी देखी गई. शुक्ला दावा करते हैं कि इसके चलते बुनकरों का उत्पादन 43 फीसद बढ़ा और कमाई में 75 फीसद बढ़ोतरी हुई. वे कहते हैं, ”इससे हमें बेइंतहा खुशी मिली.’’ 2019 के बाद 290 नए हथकरघा डिजाइन विकसित किए गए.

अहमदाबाद के 38 वर्षीय रमेशभाई चौहान 10वीं में फेल होने के बाद अपने पारिवारिक पेशे से जुड़ गए. उनका संयुक्त परिवार महीने में 20,000 से 25,000 रुपए तक कमा रहा था. मगर दो साल पहले चौहान ईडीआइआइ के केंद्र से जुड़े और नए डिजाइनों के साथ डिजिटल मार्केटिंग भी सीखी. उनका परिवार अब महीने में करीब 50,000 रुपए कमाता है. ईडीआइआइ लोगों को सक्षम बनाकर उनके चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए निरंतर प्रयासरत है.

खुशी का मंत्र
”मुझे खुशी मिलती है कि बुनकरों का कारोबार बढ़ा और युवा पीढ़ी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी ले रही है’’
—डॉ. सुनील शुक्ला, डाइरेक्टर जनरल, ईडीआइआइ

आंत्रप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया
स्थापना: 1983
अहमदाबाद, गुजरात