Art And Culture: Our Aesthetics Of Arts – आर्ट एंड कल्चर : कलाओं का हमारा सौंदर्यबोध

– अमूमन प्रकृति खिली-खिली लुभाती है, पर पतझड़ भी हमें सौंदर्यबोध से भर देता है।

राजेश कुमार व्यास

ललित कलाओं और उपयोगी तमाम कलाओं का आविष्कार मनुष्य ने अपने लिए नहीं, बल्कि सबके लिए किया है। कोई सुगम संगीत में आनंद की खोज करता है, कोई शास्त्रीय संगीत में शब्दों के अमूर्तन में खोना चाहता है, तो कोई नृत्य की भंगिमाओं का आस्वाद करते हुए उसमें ही अपनी तलाश करने लगता है, तो मुझ जैसा अंकिचन कैनवास पर समय के अवकाश की तलाश करते मूर्त-अमूर्त में दृश्य की अनंतताओं पर अनायास ही चला जाता है। बहरहाल, विचारों के सघन जंगल की मीठी सुवास कहीं ढूंढनी हो तो आपको कलाओं के पास ही जाना होगा। आप जाइए, वहां आपको नवीनतम विचारों का उत्स मिलेगा। सधी हुई सोच का प्रवाह वहां है, तो सौन्दर्य का अनूठा बोध वहां है। गौर करें, सुरों का आपको खास कोई ज्ञान नहीं है, परन्तु संगीत सभा में बेसुरा कोई भी यदि होता है, तो आप तत्काल पहचान लेते हैं। नृत्य में जरा भी भाव-भंगिमाएं, ताल बिगड़ती है तो आप पहचान लेते हैं। चित्रकला में जरा भी कुछ अनर्गल और भद्दा है, तो आप उससे तुरंत विरक्त हो जाते हैं। जीवन की यही तो वह लय है, जिसे बिगड़ती देखते ही अंतर्मन अनुभूति त्वरित पकड़ लेती है।

यही तो है कलाओं का सौन्दर्यबोध। शास्त्रीय संगीत को सुनते हैं, तो वहां क्या शब्दों की सहायता की जरूरत होती है? शब्दों के अमूर्तन में ही हम वहां भीतर का उजास पा लेते हैं। चित्रकला में सब कुछ सीधा-सादा ही थोड़े ना होता है। वहां टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं, रंगों का छितरापन और ढुलमुलापन, आकृतियों के बिखराव में भी हम देखने के सुख को भीतर से अनुभूत कर लेते हैं। सर्जन के क्षणों में कलाकार नहीं जानता है कि वह क्या कर रहा है, परन्तु श्रोता और दर्शक उसकी उस निर्वेयक्तिक बौद्धिकता को पहचान लेते हैं।

अमूमन प्रकृति खिली-खिली हमें लुभाती है, पर पतझड़ हमें गहरी उदासी देते हुए भी अंदर के अवर्णनीय सौंदर्यबोध से भर देता है। कला में उसे अनुभूत कर हम कभी रोते हैं, कभी बेहद भावुक हो जाते हैं, तो कभी यही असुन्दरपन हमें वर्तमान को नए सिरे से देखने की आंख भी देने लगता है। नवीन सर्जन तभी तो होगा, जब विसर्जन करेंगे। कलाएं इस सौंदर्यबोध से ही हमें साक्षात कराती है।
(लेखक कला समीक्षक हैं)