Art And Culture: The Art Of Cloud-Peacock And Drishti – आर्ट एंड कल्चर : मेघ-मोर और दृष्टि की कला सृष्टि

प्रकृति के अनाहत नाद में बचेगा वही जो रचेगा। क्यों न हम बारिश की बूंदों को अपने भीतर रचें।

डॉ. राजेश कुमार व्यास, (कला समीक्षक)

सावन माने मेघों से घिरा आकाश, झमाझम बरखा और केकाध्वनि! मोर की पुकार कोयल-सी मीठी नहीं होती पर कांसे जैसे बजने वाली उसकी ध्वनि मुग्ध करती है। केकाध्वनि संग ही अनुभूत होता है-मेघों से घिरा आकाश, घने वनों में छाने वाली छाया और विरह-वेदना सरीखा अंधकार-उजास!

बारिश की बूंदें असल में मन को गढ़ती हैं, कुछ रचने के लिए। आसमान से टप-टप गिरती बूंदें जैसे हमें जगाती हैं – कुछ करने के लिए। बारिश को देखें ही नहीं, उसे सुनें और गुनें भी। लगेगा प्रकृति आपके भीतर गा रही है। मन का यह जो गान है, वही अनाहत नाद है। साहित्य, संगीत और कलाओं का हमारे भीतर का अग्रज नाद! अनाहद नाद का मूल स्रोत हमारी अनुभूति है। प्रकृति को महसूस करने की हमारी दृष्टि है। भावात्मक होने से यह अव्यक्त यानी अविगत है। सूरदास का पद है, ‘अविगत गति कछु कहति न आवै।…’ दृष्टि की यह सृष्टि ऐसी ही है। अवर्णनीय! संगीत के इतिहास लेखक सांबमूर्ति कहते हैं, ‘अनाहत नाद को हमें महत्त्व देना चाहिए। नाद से ही यह समस्त विश्व निनादित जो है।’ सच ही तो कहते हैं सांब! बारिश जब होती है तो मोर बोलते हैं। कोयल गाती है। चिडिय़ाएं चहचहाती हैं। प्रकृति मौन में भी अनूठे संगीत का आस्वाद कराने लगती है। कलाकृति प्रकृति के इन गुणों से ही क्या नहीं निकलती!

वर्षा के इस मौसम में मन के भीतर के नाद को सुनें। लगेगा आप वह नहीं है जो हैं। अपने भीतर छुपे कलाकार को तब आप पहचानने लग जाएंगे। लगेगा, आप भी कुछ रच सकते हैं। संगीत, नृत्य, चित्रकलाओं का जन्म भीतर के इस कलाकार से ही तो होता है। मन प्रकृति से ही तो प्रेरणा ग्रहण करता है। इसीलिए तो हमारे यहां कहा गया है, कलाएं केवल शरण्य ही नहीं हैं, आश्रय भी हैं। इनमें अपने आपको अभिव्यक्त कर बहा जा सकता है, तैरा जा सकता है। सच्ची कला आपको वहां ले जाती है जहां आप पहले कभी न गए हों। कई बार वह जानी-पहचानी जगह पर भी ले जाती है, पर तब उस स्थान को अप्रत्याशित ढंग से देखने के लिए वह आपको प्रेरित भी करती है।

प्रकृति के इस अनाहत नाद में बचेगा वही जो रचेगा। तो क्यों न हम बारिश की बूंदों को अपने भीतर रचें। संजो लें सृष्टि के इस अनुभव को सदा के लिए। लगेगा, प्रकृति कितना कुछ हमें दे रही है। हम क्या उससे उतना ले रहे हैं!